कहानी ‘चंगा पो’ लॉकडाउन में परिवार की दादी को बताती है, जबकि कविता ‘माइंडलेस महिला’ आधुनिक महिला की प्रसिद्धि के बारे में जानती है। कहानी ‘चंगा पो’ बयां करती है लॉकडाउन में दादी को मिला परिवार का सुख, वहीं कविता ‘दिमाग वाली महिला’ से जानें आधुनिक नारी के ख्यालात


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4 दिन पहले

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99 1602167007 कहानी 'चंगा पो' लॉकडाउन में परिवार की दादी को बताती है, जबकि कविता 'माइंडलेस महिला' आधुनिक महिला की प्रसिद्धि के बारे में जानती है।  कहानी 'चंगा पो' बयां करती है लॉकडाउन में दादी को मिला परिवार का सुख, वहीं कविता 'दिमाग वाली महिला' से जानें आधुनिक नारी के ख्यालात

कहानी … चंगा-पो

लेखक: अतुल कनक

पिता की चिंताओं की सीमा उनकी सम्पत्ति है, इसके अहसास बाबूजी को था। उन्होंने वसीयत की, अपनी अहमियत को ध्यान में रखते हुए।

कोरोनावायरस का प्रकोप शुरू हुआ तो देश भर में अजीब-सी दहशत का माहौल बन गया। पोती दूसरे शहर में पढ़ रही थी, लेकिन उन्होंने बेटे से ज़िद करके उसे भी अपने पास ही बुला लिया। जान से ज़्यादा क़ीमती थोड़े ही होती है पढ़ाई। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा! यही न तो एक साल ख़राब हो जाएगा। लेकिन उस कर्ता शहर में बेटी को कुछ हो गया तो? हालांकि वापसी के बाद पोती ने बताया कि उसका कालेज दो दिन बाद बंद हो जाएगा और कब खुलेगा- यह पता नहीं। प्रिंसिपल ने कहा है कि वो कालेज के सोशल मीडिया ग्रुप में ख़बर कर लेगी।

पोती को लौटे कुछ दिन ही हुए थे कि देश भर में लाकडाउन की घोषणा हो गई। अब वो सबको समझाते हुए कहने लगीं- ‘मैं तो जानती थी कि ऐसा ही कुछ होगा। तभी तो मैंने पोती को भी बुलाया था। आँखों की रोशनी कमज़ोर हुई है, लेकिन पच्यासी सालों में इन आँखों ने दुनिया को इतना देखा है कि बहुत सारी चीज़ों को समझने के लिए कुछ भी देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। ‘ फिर वो अपनी पसंद की कोई किताब पढ़ने लगता है या फिर ग्रंथ फेरने लगता है। पिछले कुछ दिनों से उन्होंने टीवी देखना भी बंद कर रखा था।

वे एक स्कूल के प्रिंसिपल के पद से रिवाइंड हुए थे। उम्र पच्यासी सालों हो गई थी लेकिन आज भी बहुत से लोग उन्हें बहनजी कहकर ही पुकारते थे। कई बार मौक़ा मिलता है तो वह स्कूल में अपने रौब की कहानियाँ भी सुनाती हैं। कहतीं- ‘मेरे पढ़ाए बच्चे आज भी कहीं मिलते हैं तो पहचान जाते हैं और हंसते हुए बताते हैं कि मैंने किस बात पर नाराज़ होकर उन्हें कक्षा से बाहर निकाला था या कान पकड़कर कोने में खड़ा कर दिया था।

कुछ तो बहुत बड़े अफ़सर हो गए हैं। वास्तव में, उस ज़माने में टीचर अगर बच्चे को पीट देता था तो माता-पिता इतना बुरा नहीं मानते थे कि मामला को थाने में ले जाएं। उनका भी मानना ​​है कि टीचर ने बच्चे की भलाई के लिए ही ऐसा किया होगा। अब तो चीजें बहुत बदल गई हैं। ‘

लाॅकडाउन लगा तो सब अपने-अपने घरों में क़ैद साथ रह गए। वे पहले एक परिचित ऑटो वाले को बुलाकर कभी-कभी किसी रिश्तेदार के यहाँ हो आए थे करते थे। लेकिन लॅकडाउन केनर्स दिनों में तो घर से आवाजाही पर ही प्रतिबंध था।

जब लाकडाउन के प्रतिबंधों में ढील शुरू हुआ, तब भी बेटे ने कहा कि वर्तमान में निकलना उनकी उम्र के लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है क्योंकि संक्रमण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को बुरी तरह ख़राब कर देता है। वे अपने कमरे से बाहर निकलतीं और यह कहते हुए आंगन में अपनी कुर्सी पर बैठ जातीं, ‘सीताराम, सीताराम, सीताराम कहिए / जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए।’

लाकडाउन शुरू हुआ तो सभी घरों में क़ैद थे। इस मजबूरी ने सबको परेशान कर दिया था। लेकिन उनके लिए तो जैसे चहक के दिन लौट आए थे। इकलौती पोती- जो दूर एक महानगर में पढ़ती थी, उनके पास लौट आई थी। बेटे दिन भर नौकरी और प्रविष्टियों में व्यस्त रहता था, वह भी उनके पास ही बैठकर बतियाता रहता था।

बहू घर का काम करती है और वह भी आकर उनके पास बैठ जाती है। पहले वे भी इधर-उधर के कामों में व्यस्त रहते थे। एक पालतू कुत्ता था जो कभी उनके पास आकर बैठ जाता है, कभी घर के मेनद्वार पर बैठकर घर के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी की सूची रखता है। कामवाली बतों का आना लाॅकडाउन में बंद हो गया था ।… तो एक बार फिर आपस में साथ बैठने और होनेियाने का सिलसिला शुरू हो गया है। कई बार वो अपने आप से कहतीं- ‘कोरोना ने इतना सुख दिया तो।’

एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने अपनी पोती से कहा कि उनकी जवानी के दिनों में जब दोपहर में लोग अपने काम निबटा लेते थे तो चंगा-पो (अष्ट चंगा पो) खेलते थे। पोती ने इस खेल का नाम ही नहीं सुना था। उन्होंने दिलचस्पी दिखाई तो उन्होंने चंगा-पो के बारे में बताया।

फिर कांपते हाथों से लकड़ी के एक बंधन पर चाक की मदद से चंगा-पो बना भी दिया। पोती ने ज़िद की तो उन्होंने अपने बेटे और बहू को भी साथ बिठा लिया खेलने के लिए। बस, अब तो नियम ही हो गए हैं। रोज़ शाम को तीन-चार बाज़ी होतीं चंगा-पो की। आपस में हंसी-मज़ाक भी होता है।

लॅकडाउन ने जैसे उनके लिए न्यू चहक के द्वार खोल दिए थे। चूंकि उनके अलावा किसी के पास चंगा-पो का पुराना अभ्यास नहीं था, इसलिए शुरू-शुरू में तो वे ही जीततीं, लेकिन तीन-चार दिन बाद पोती ने उन्हें हराना शुरू कर दिया। वे जैसे ही हारतीं, पोती उल्लास से कहती- ‘देखा दादी, तुम ही सीखकर तुम्हें ही हरा दिया न।’ भव्य पोती की बात सुनकर हंस देतीं। ये सच तो वो ही जानती थे न कि पोती की रुचि खेल में बनाए रखने के लिए उन्होंने विनिर्देशकर ऐसी ग़लतियों की नान कि उनकी हार हो जाए।

अनलाक की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बेटा ऑफिस जा रहा है। बहू ने शुरू में तो सभी सामान ऑनलाइन ही मंगाए थे, लेकिन अब वो भी कभी-कभी बाजार जाने लगी है। पोती की ऑफलाइन पढ़ाई शुरू हो चुकी है। वो जानती हैं कि सब शाम तक थक जाते हैं लेकिन फिर भी वो अपनी पलंग पर लकड़ी का वही ढेर लेकर खेलते ही चंगा पो खेलने का अभ्यास करती रहती हैं। ऐसे में कभी पोती, बहू या बेटा आकर कह दें कि ‘एक बाजी हो जाए- तो वो जैसे खिल उठती हैं।]

इन दिनों चंगा-पो खेलते हुए वो संभावना: सभी से हारने लगे हैं। लेकिन इस हार का सच केवल वही जानती हैं। पच्यासी सालों की उम्र में इतना तो समझ ही गए हैं कि किसी भी खेल में जीतना उतना ज़रूरी नहीं होता, जितनी मिल-जुलकर खेलना। यूं भी अपनों से हारने का सुख क्या है, यह बात भी उनसे बेहतर कौन समझ सकता है?

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कविता … दिमागी स्त्री से प्रेम

लेखक: अनुपमा भगत

आसान नहीं होता है दिवाली स्त्री से प्रेम करना,

क्योंकि उसे पसंद नहीं है।

झुकती नहीं वो कभी जब तक न हो

रिश्तों और प्रेम की मजबूरी।

तुम्हारी हर हां में हां और नहीं में न कहना वो नहीं जानती,

क्योंकि उसने सीखा ही नहीं झूठ की डोर में रिश्तों को बांधना सीखा।

वे नहीं जानती स्वांग की चाशनी में डुबोकर अपनी बात मनवाँ,

वह तो जानती है बेबाकी से सच बोल जाना।

फ़िज़ूल की बहस में पड़ना उसकी आदतों में शुमार नहीं,

लेकिन वो जानती है तर्क के साथ अपनी बात रखना।

उन क्षणों-क्षणों-कपड़ों की मांग ने नहीं किया,

वो तो संवारती है स्वयं को विश्वास से,

निखारती की अपनी व्यक्तित्व मासूमियत भरी मुस्कान है।

तुम्हारी ग़लतियों पर तुम्हें टोकती है,

तो तकलीफ़ में आपको संभालती भी है।

उसे घर संभालना बख़ूबी आता है,

तो अपने सपनों को पूरा करना भी।

अगर नहीं आता है तो किसी की अनर्गल बातों को मान लेना।

पौरुष के आगे वे नतमस्तक नहीं होते,

झुकती है तो आपके निस्वार्थप्रेम के आगे।

और इस प्रेम की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है।

हौसला हो शुद्धाने का केवल ऐसी महिला से प्रेम करना,

क्योंकि टूट जाता है वह धोखे से, छलावे से,

फिर जुड़ने नहीं पाती किसी प्रेम की ख़ातिर।



https://www.bhaskar.com/ladies/way of life/information/story-changa-po-tells-the-grandmother-of-the-family-in-lockdown-while-the-poem-mindless-woman-learn-about-the-fame-of-modern-woman-127792641.html

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